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लाइफस्टाइल 18 May, 2026

Netherlands ने भारत को लौटाए 1000 वर्ष पुराने चोल साम्राज्य के ताम्रपत्र

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भारत की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी एक ऐतिहासिक उपलब्धि सामने आई है। प्रधानमंत्री Narendra Modi की Netherlands यात्रा के दौरान डच प्रधानमंत्री Dick Schoof ने भारत को चोल साम्राज्य के लगभग 1000 वर्ष पुराने ऐतिहासिक ताम्रपत्र औपचारिक रूप से सौंपे। ये ताम्रपत्र लंबे समय से Netherlands में सुरक्षित रखे गए थे और भारत कई वर्षों से उनकी वापसी की मांग कर रहा था।

यह कदम केवल ऐतिहासिक धरोहर की वापसी नहीं माना जा रहा, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान, इतिहास और विरासत संरक्षण के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
 

क्या हैं ये ऐतिहासिक ताम्रपत्र ?

ये ताम्रपत्र “आनाइमंगलम ताम्रपत्र” (Anaimangalam Copper Plates) के नाम से जाने जाते हैं और इनका संबंध दक्षिण भारत के शक्तिशाली Chola Empire से है। इतिहासकार इन्हें महान चोल शासक राजराज चोल प्रथम के शासनकाल से जोड़ते हैं।

इन ताम्रपत्रों में नागपट्टिनम स्थित प्रसिद्ध बौद्ध विहार “चूडामणि विहार” को दिए गए भूमि अनुदान और प्रशासनिक घोषणाओं का उल्लेख मिलता है। इन पर तमिल और संस्कृत भाषाओं में शिलालेख अंकित हैं, जो उस समय की शासन व्यवस्था और सांस्कृतिक परिस्थितियों की जानकारी देते हैं।
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ताम्रपत्रों की संरचना और विशेषताएं

इन ताम्रपत्रों की सबसे खास बात उनकी संरचना और शाही प्रतीक हैं।

  • कुल 24 ताम्रपत्र
  • लगभग 30 किलोग्राम वजन
  • तांबे की गोलाकार रिंग से जुड़े हुए
  • रिंग पर चोल साम्राज्य की शाही मुहर अंकित

मुहर पर उकेरे गए प्रतीकों का विशेष महत्व माना जाता है:

  • बैठा हुआ बाघ — चोल वंश का प्रतीक
  • मछलियां — पांड्य वंश का प्रतीक
  • धनुष — चेर वंश का प्रतीक
  • शाही छत्र — राजसत्ता और साम्राज्यिक शक्ति का प्रतीक

इतिहासकारों के अनुसार, ये ताम्रपत्र उस समय के समुद्री व्यापार, धार्मिक दान व्यवस्था, प्रशासनिक प्रणाली और दक्षिण भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं।

Netherlands कैसे पहुंचे ये ताम्रपत्र?

इतिहास के अनुसार, 17वीं शताब्दी में Dutch East India Company ने दक्षिण भारत के नागपट्टिनम क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाया था। उसी दौरान ये ताम्रपत्र भारत से बाहर चले गए।

बाद में Dutch अधिकारी Floris Adriaan van Braam Houckgeest के पास इनके पहुंचने का उल्लेख मिलता है। वर्ष 1862 में इन्हें Netherlands की प्रसिद्ध Leiden University को सौंप दिया गया, जहां ये लगभग 160 वर्षों तक सुरक्षित रखे गए।

Netherlands में इन्हें “Leiden Plates” के नाम से जाना जाता था।
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भारत ने कैसे शुरू किए वापसी के प्रयास ?

भारत सरकार लंबे समय से Dutch सरकार और Leiden University के साथ राजनयिक स्तर पर बातचीत कर रही थी। भारतीय पुरातत्व और सांस्कृतिक विशेषज्ञ लगातार इन ताम्रपत्रों को भारत की ऐतिहासिक धरोहर बताते हुए उनकी वापसी की मांग करते रहे।

वर्ष 2022 में Netherlands सरकार ने औपनिवेशिक काल के दौरान दूसरे देशों से लाई गई कलाकृतियों और सांस्कृतिक वस्तुओं को उनके मूल देशों को लौटाने की नीति को मंजूरी दी। इसके बाद भारत को ये ताम्रपत्र लौटाने की प्रक्रिया तेज हुई।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया Netherlands यात्रा के दौरान इस प्रक्रिया को औपचारिक रूप दिया गया और ताम्रपत्र भारत को सौंप दिए गए।
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भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला ?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला कई कारणों से महत्वपूर्ण है:

1. सांस्कृतिक विरासत की वापसी

यह भारत की ऐतिहासिक धरोहर को उसके मूल स्थान पर वापस लाने की दिशा में बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

2. औपनिवेशिक इतिहास से जुड़ा कदम

औपनिवेशिक काल में भारत से बाहर गई कई कलाकृतियों और ऐतिहासिक वस्तुओं की वापसी को लेकर वैश्विक स्तर पर चर्चा बढ़ रही है। यह कदम उसी दिशा में एक सकारात्मक उदाहरण माना जा रहा है।

3. भारत–Netherlands संबंध मजबूत होंगे

विशेषज्ञों के अनुसार, इससे दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और कूटनीतिक संबंध और मजबूत होंगे।

4. इतिहास शोध को मिलेगा लाभ

इन ताम्रपत्रों के भारत लौटने से इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और छात्रों को चोल साम्राज्य के इतिहास को और बेहतर ढंग से समझने का अवसर मिलेगा।
 

चोल साम्राज्य क्यों था खास ?

Chola Empire दक्षिण भारत का सबसे शक्तिशाली समुद्री साम्राज्य माना जाता है। चोल शासकों ने दक्षिण भारत के अलावा श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया तक अपना प्रभाव स्थापित किया था।

राजराज चोल प्रथम और राजेंद्र चोल प्रथम के शासनकाल में:

  • समुद्री व्यापार तेज हुआ
  • विशाल मंदिरों का निर्माण हुआ
  • प्रशासनिक व्यवस्था मजबूत बनी
  • कला, साहित्य और संस्कृति को बढ़ावा मिला

इसी कारण चोल काल को दक्षिण भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग भी कहा जाता है।
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निष्कर्ष

Netherlands द्वारा भारत को 1000 वर्ष पुराने चोल ताम्रपत्र लौटाना केवल एक ऐतिहासिक वस्तु का हस्तांतरण नहीं है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक पहचान, इतिहास और विरासत के सम्मान का प्रतीक भी है। यह घटना दुनिया भर में मौजूद भारतीय धरोहरों की वापसी की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में अन्य देशों में मौजूद भारतीय ऐतिहासिक धरोहरों की वापसी को लेकर भी ऐसे प्रयास तेज हो सकते हैं।


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